Sunday, May 31, 2009

में तुमसे कुछ मांगता हूँ

तुम मेरे

तुम्हारी धड़कने मेरी

तुम्हारा दिल मेरा

तुम्हारी चाहत मेरी

तुम्हारी आरजू मेरी

तुम्हारे सपने मेरे

तुम्हारा एहसास मेरा

तुम दोस्त मेरे

तुम हबीब मेरे

तुम करीब मेरे

तुम्हारी आवाज़ मेरी

तुम्हारी जिद मेरी

सब कुछ मेरा

फिर भी मैं

हमेश तुमसे मांगता हूँ !

16 टिप्पणियाँ:

  1. स्वागतम
    शब्द पुष्टि हटाइय दो जी

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  2. भैया सीधे-सीधे ही कह देते -

    "एक जिस्म दो जान"

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  3. जब सब कुछ तुम्हारा है तब माँगते क्या हो? ः)

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  4. शुभकामनाएं....

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  5. उफ़ ये मुहब्बत?
    स्वागत है।

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  6. हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है....

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  7. sab tumhara hai, fir bhee mangate ho, bade vinmar ho balak. narayan narayan

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  8. प्रिय बन्धु
    जय हिंद
    सिर्फ यही एक कविता है ,बाकी सारा ब्लॉग तो आईनेक्स्ट सेंटर के लिए है
    अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें

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  9. islamic web in hindi
    www.islamicwebdunia.com

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  10. हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है....

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  11. बहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

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  12. jo apni hoti hai use manga nahi jata...use sambahlkar rakha jata hai
    uski dhadkan ko mahsus kar chahto ko dil me basaya jata hai.
    uski arju ko samjhh kar sapno ko pura kiya jata hai.
    habib aur karib hai to daklif bhi samjhte honge uski .jid hai to kis liya wo bhi samjhte honge.to mang kon raha hai aap ya wo.....

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  13. बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |

    बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
    अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर

    सनसनाते पेड़
    झुरझुराती टहनियां
    सरसराते पत्ते
    घने, कुंआरे जंगल,
    पेड़, वृक्ष, पत्तियां
    टहनियां सब जड़ हैं,
    सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |

    बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
    पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
    पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
    तड़तड़ाहट से बंदूकों की
    चिड़ियों की चहचहाट
    कौओं की कांव कांव,
    मुर्गों की बांग,
    शेर की पदचाप,
    बंदरों की उछलकूद
    हिरणों की कुलांचे,
    कोयल की कूह-कूह
    मौन-मौन और सब मौन है
    निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
    और अनचाहे सन्नाटे से !

    आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
    महुए से पकती, मस्त जिंदगी
    लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
    पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
    जंगल का भोलापन
    मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
    कहां है सब

    केवल बारूद की गंध,
    पेड़ पत्ती टहनियाँ
    सब बारूद के,
    बारूद से, बारूद के लिए
    भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
    भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।

    फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    बस एक बेहद खामोश धमाका,
    पेड़ों पर फलो की तरह
    लटके मानव मांस के लोथड़े
    पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
    टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
    सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
    मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
    वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
    ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
    निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
    दर्द से लिपटी मौत,
    ना दोस्त ना दुश्मन
    बस देश-सेवा की लगन।

    विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
    अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
    बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
    अपने कोयल होने पर,
    अपनी कूह-कूह पर
    बस्तर की कोयल होने पर
    आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?

    अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से

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