तुम मेरे
तुम्हारी धड़कने मेरी
तुम्हारा दिल मेरा
तुम्हारी चाहत मेरी
तुम्हारी आरजू मेरी
तुम्हारे सपने मेरे
तुम्हारा एहसास मेरा
तुम दोस्त मेरे
तुम हबीब मेरे
तुम करीब मेरे
तुम्हारी आवाज़ मेरी
तुम्हारी जिद मेरी
सब कुछ मेरा
फिर भी मैं
हमेश तुमसे मांगता हूँ !
स्वागतम
ReplyDeleteशब्द पुष्टि हटाइय दो जी
भैया सीधे-सीधे ही कह देते -
ReplyDelete"एक जिस्म दो जान"
जब सब कुछ तुम्हारा है तब माँगते क्या हो? ः)
ReplyDeleteशुभकामनाएं....
ReplyDeleteउफ़ ये मुहब्बत?
ReplyDeleteस्वागत है।
बहुत अच्छे
ReplyDeleteहिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है....
ReplyDeletebahut badhiyaa!
ReplyDeletesab tumhara hai, fir bhee mangate ho, bade vinmar ho balak. narayan narayan
ReplyDeleteप्रिय बन्धु
ReplyDeleteजय हिंद
सिर्फ यही एक कविता है ,बाकी सारा ब्लॉग तो आईनेक्स्ट सेंटर के लिए है
अगर आप अपने अन्नदाता किसानों और धरती माँ का कर्ज उतारना चाहते हैं तो कृपया मेरासमस्त पर पधारिये और जानकारियों का खुद भी लाभ उठाएं तथा किसानों एवं रोगियों को भी लाभान्वित करें
bahut khoob
ReplyDeleteislamic web in hindi
ReplyDeletewww.islamicwebdunia.com
हिंदी ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है....
ReplyDeleteबहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
ReplyDeletejo apni hoti hai use manga nahi jata...use sambahlkar rakha jata hai
ReplyDeleteuski dhadkan ko mahsus kar chahto ko dil me basaya jata hai.
uski arju ko samjhh kar sapno ko pura kiya jata hai.
habib aur karib hai to daklif bhi samjhte honge uski .jid hai to kis liya wo bhi samjhte honge.to mang kon raha hai aap ya wo.....
बस्तर के जंगलों में नक्सलियों द्वारा निर्दोष पुलिस के जवानों के नरसंहार पर कवि की संवेदना व पीड़ा उभरकर सामने आई है |
ReplyDeleteबस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अपने कोयल होने पर, अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
सनसनाते पेड़
झुरझुराती टहनियां
सरसराते पत्ते
घने, कुंआरे जंगल,
पेड़, वृक्ष, पत्तियां
टहनियां सब जड़ हैं,
सब शांत हैं, बेहद शर्मसार है |
बारूद की गंध से, नक्सली आतंक से
पेड़ों की आपस में बातचीत बंद है,
पत्तियां की फुस-फुसाहट भी शायद,
तड़तड़ाहट से बंदूकों की
चिड़ियों की चहचहाट
कौओं की कांव कांव,
मुर्गों की बांग,
शेर की पदचाप,
बंदरों की उछलकूद
हिरणों की कुलांचे,
कोयल की कूह-कूह
मौन-मौन और सब मौन है
निर्मम, अनजान, अजनबी आहट,
और अनचाहे सन्नाटे से !
आदि बालाओ का प्रेम नृत्य,
महुए से पकती, मस्त जिंदगी
लांदा पकाती, आदिवासी औरतें,
पवित्र मासूम प्रेम का घोटुल,
जंगल का भोलापन
मुस्कान, चेहरे की हरितिमा,
कहां है सब
केवल बारूद की गंध,
पेड़ पत्ती टहनियाँ
सब बारूद के,
बारूद से, बारूद के लिए
भारी मशीनों की घड़घड़ाहट,
भारी, वजनी कदमों की चरमराहट।
फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
बस एक बेहद खामोश धमाका,
पेड़ों पर फलो की तरह
लटके मानव मांस के लोथड़े
पत्तियों की जगह पुलिस की वर्दियाँ
टहनियों पर चमकते तमगे और मेडल
सस्ती जिंदगी, अनजानों पर न्यौछावर
मानवीय संवेदनाएं, बारूदी घुएं पर
वर्दी, टोपी, राईफल सब पेड़ों पर फंसी
ड्राईंग रूम में लगे शौर्य चिन्हों की तरह
निःसंग, निःशब्द बेहद संजीदा
दर्द से लिपटी मौत,
ना दोस्त ना दुश्मन
बस देश-सेवा की लगन।
विदा प्यारे बस्तर के खामोश जंगल, अलिवदा
आज फिर बस्तर की कोयल रोई,
अपने अजीज मासूमों की शहादत पर,
बस्तर के जंगल के शर्मसार होने पर
अपने कोयल होने पर,
अपनी कूह-कूह पर
बस्तर की कोयल होने पर
आज फिर बस्तर की कोयल रोई क्यों ?
अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त साहित्यकार, कवि संजीव ठाकुर की कलम से