
कितना ख़ूबसूरत समां था । मेरी नज़रें उसके संगमरमरी बदन पर पड़ती,मेरे शरीर का रोम रोम उसके स्पर्श की कल्पना में , दिल बार बार उस उपरवाले का शुक्रिया अदा करता जिसने उसे हमें अपने करीब लाने का मौका दिया । ये तमाम बातें किसी सपने की तरह हैं। जैसे ही उसकी नज़रें मेरी नज़रों से मिलती - वो कल्पना एक सपने की तरह से बिखर जाती । मैं मुस्कुरा उठता , सोचता - सचमुच ! वो एक सपने के सामान है।
वो हर बार अपनी जुल्फों को सवांरती, हसीं लबों को पोछती । अपने आँचल को संजोती , थोड़ा कसमसाती कुछ बुदबुदाती है और आखिरकार पूछती है- क्या हम जोकर लग रहें हैं ? मैं कहता -" नही तो " ! वो फिर पूछती - " तो फिर आप हमें देखकर मुस्कुरा क्यों रहें है ? मैं फिर मुस्कुरा उठता । क्या जवाब दूँ उसे मैं ।
पेंटिंग निलोफेर की वेबसाइट सी ली गयी हैं । थैंक्स फॉर गुड पेंटिंग्स ।
No comments:
Post a Comment